पंचचामर छंद
वेद के सूक्त
अब छत्तीसगढ़ी में
*********************************
यह काव्यांश
ऋग्वेद पंचम मंडल में परमात्मा ने विद्वानों (तत्वग्यानी , तत्ववेत्ता)और गुरूजनों के प्रति जो आदेश
किया है कि वे किन सुपात्रों को व्रम्हविद्या का दान कर लाभान्वित करें इस पर
छंदमय भाष्य हिन्दी अर्थ सहित .......
सुजान जीत देह
ला, बने सुभाव पाय हो ।
घमाय ना सिताय
जे,सबोच पार जाय हो । ।
खुसी बिसाद मे
रमे, न सोक में चिपाय हो ।
न चेर में परे
कभू , न मान के खखाय हो ।।
न मोह मे मताय
हो, न भोग मे झपाय हो ।
सुबाट सत्य मा
चलै, परोपकार भाय हो । ।
सदा कसे लंगोट
ला , गियान के ललाय हो।
उहीच ला
गुरूददा, गियान दे बढाय हो । ।
भावार्थ-:
जिन्होनें अपने शरीर को जीत लिया हो, अर्थात जो न तो धूप में ताप का अनुभव करता हो
और ना ठंड मे सर्दी अनुभव करता हो बल्कि इन दोनो अवस्थाओं के पार चला गया हो , जो न तो हर्ष
और विषाद में से किसी में भी रमण करता हो और न ही शोक के दबाव
में आकर संतप्त होता हो, जो किसी की निंदा या स्तुति आदि मे न पडता हो और न जिसे मान सम्मान की भूख हो
और जो मोह के मादकता मे मत्त न हो, जो न तो भोग के प्रति लालायित रहता हो न भोग
के साधनो के चिंतन स्पर्श आदि से पतित होता हो, जो सदा सुंदर सत्यपथ मे चलता हो और जिसे
परोपकार करना सुखद लगता हो, जो सदैव ब्रम्हचर्य अर्थात सदैव परमपिता परमात्मा के पवित्र चिंतन मनन स्मरण
और नाम तथा गुण समूहों के गान मे रत रहता हो एैसे भगवद्भक्त को ही
ब्रम्हविद्या दान किया करे जो तत्व को जानने के लिए लालायित रहते हो, हे पितातुल्य
सद्गुरू तत्व के पूर्णज्ञाता योग्य शिष्यों को तत्व ग्यान देकर बढायें ।
शोभामोहन
No comments:
Post a Comment