कालकोठरी आठे के
तिथि (कुकुभ छंद)
1/
काल कोठरी आठे के
तिथि , भादो रात निचट कारी।
साँवर सुघर
कन्हइया जनमे, हरे जगत के अँधियारी।।
2/
जबर हथकड़ी साँकर छूटिस, गिरगे टूट-टूट बेली।
महतारी अउ बाप
छुड़ाके, करत कंस ले बरपेली ।।
3/
सबो पहरिया नशा
करे कस, मनगम नींद लगिन भाँजे ।
बर्रावत मुसकावत-
मुचमुच, सपनावत अंतस माँजे।।
4/
फाटक खुलगे जेल
कोठरी, धंँधनी खोली उजरागे ।
एक संग कतको ठन
सूरुज, उवे हवय तइसन लागे ।।
5/
नारफूल सुद्धा सूपा मा, वसुदेवा धरके जाये।
जे मितान घर जाये
निकले, माँझ म जमुना उफनाये।।
6/
ठउका जमुना जल मा
उतरिस, सनसनात बाढ़िस पूरा ।
वसुदेवा के पोंटा
काँपत, अपन लुकावत हे टूरा ।।
7/
टोंटा भर पानी मा
नहकत, बाप धरम हे बड़ भारी ।
कलपत रोवत काल
कोठरी, छटपटात हे महतारी।।
8/
रझरझ-रझरझ पानी
बरसत, शेषनाग छत्तर ताने।
जमुना जल
उफना-उफना के, गोड़ छुवे जब्बर ठाने ।।
9/
तीन लोक चउदहो
भुवन के, अगम बात ला प्रभु जाने ।
जमुना जल हर पाँव
पखारिस, आस पुरिस हे तब माने।।
10/
जमुना नहके बाट ल
देइस , वसुदेवा ला तब जाके ।
रात दुआरी सँकरी
बाजिस, नंद जागथे कउवा के।।
11/
अपन मीत के देख
दशा ला, आँखी ले छलकत आँसू ।
कहत बार नइ बाँधत
हे सुख, होगे दुख हर जनमासू ।।
12/
लइका ला जसुदा
कोरा दे, साँस लेत हे वसुदेवा ।
सुख दुख बाँटत हे
मितान सँग, जिनगी भर के सब केवा।।
13/
मइया जसुदा डार
डिठौना, काजर आँजत सुघराये।
चंदन अतर फुलेल
छिंचाये, झबला कोंवर पहिराये ।
14/
नंद गाँव नर नारी
लइका, चूमे -चाँटे सब आके ।
सरग सुख ल वो
निंदरत हावँय, भुँइया मा नर तन पाके।।
15/
सबो देवता साध
सधाये, नाना तन ला धर आये ।
गइया बछरू पंछी
बनके, पबरित दरसन सुख पाये।।
15/
आवत खानी पछुवाये
मन, देह धरे बर लुलुवागे।
उहू देव ब्रज
धुर्रा बनके, हरि लीला देखनलागे ।।
16/
ऋषि मुनि बनके
गोपी ग्वाला , परगट पुन के सुख लूटे ।
दरस परस कर लाहो
ले बर, सबके जीव रहत छूटे ।।
17/
बारो मास बसंती
आके, ब्रज भुइँया म लोरियाये।
तुर्रा दूध गिरावत
गइया, कृष्ण कृष्ण कहि रँभाये।।
शोभामोहन
[28/0819 10:01]
●सब काटत बेरा आरी (कुकुभ)●
छिन भर झेले
नहीं सकय दुख , तन ला चाही सुखियारी।
भुला गये
गिंजरन घुमरन मा, काकर करथन बनिहारी ।।
भुलन जड़ी ला
खुँद ड़ारे हे, सार बात ला बिसराये ।
सुख दुख के
निरवार करत हे , नत्ता मा जोरे चटकाये ।।
चपकत उखरा पाग
ला बाँधे, मीठ घलो होवत खारो ।
रचत हवय जंजाल
अरझना , अटघा करके हजारों ।।
नाम छोड़ कुछु
काम न आवै, मलकत ड़ोंगा मँझधारी।
मन ला जग
सतरंग बलावत, बेरा के चलत कटारी ।।
शोभामोहन
●राम जपन ले अलहन टरही( कुकुभ)●
जिनगी भर बड़
उठापटक कर, जोरत हस दू गज तीखा ।
करू कसा ला
जबरन लीले, अमृत पाय नइ अउ चीखा।।
पल म छूट जही मेछरा झन, जिनगी के
नाजुक डोरी।
पाप काटही लाग
नता मन, करत नाहवन धर ओरी।।
जेन नता के
मानी पीथस, लउहाही बन कठियारा ।
अपन गरज सब
सुरता करके, रोहीं-गाहीं सतधारा।।
लंबरदार लगाही
आगी, भरभर-भरभर बर जाबे।
दू दिन गाँव म
चर्चा होही, पानी पाँच पसर पाबे।।
मूँड़ मुड़ा के छूत काटहीं, खात-खवाई बड़
होही।
कलप-कलप सुख
सुरता करही, ए जग मा छूटे जोंही।
हाड़ा-हपट
कमाये धन मा, काँड़ी संग नहीं जाही।
मन मुरकेटे
जोरे जोरन, दूसर फुदर फुदर खाही।।
बेरा हावय
कतका बाँचे, अगम बात न कहूँ जाने।
राम जपन ले अलहन टरही, अउ हो जाही मन
आने।।
शोभामोहन
●चउमास घरी (कुकुभ छंद )●
सनन-सनन सन
मचलत पुरवा, झुमरत पेड़ मगन भारी।
मया मितानी
गोठ करे बर, छछलत नार जबर डारी।।
पेंड़ फोंक
कोंवर पाना मन, नाचत झूमत लहराये ।
दूल्हा डउका
असन लगत हे, मूँड़ी मउर ल खपवाये।।
गड़गड़ -गड़गड़
गरजत बादर , जइसे मंगल धुन बाजे।
भुँइया गवनाही
कस लागे, अंग-अंग गहना साजे।।
उफनत छलकत
मटकत नदियाँ, गिंजरत छेल्ला दिन पाये ।
सागर सजन
बलावत हावय, बिलमत नइ हे बिलमाये।।
शोभामोहन
फूल टुकनी भर बोहे अउ
छींचथस गाँव गली पारा।
कोन तोर हारीहारा।
मया दया के बिरवा बोंथस,
बोल बला लेथस झारा।
कोन तोर हारीहारा।।
सेम्हर पोनी तोर गदेली,
लूथस धान बोह भारा।
कोन तोर हारीहारा।।
पिंयर पिंयर चुटुक चुनरी
चटके चंदा सितारा ।
कोन तोर हारीहारा।।
लहर लुगरा गंध छिंचत हे ।
ममहावत हे घर सारा।
कोन तोर हारी-हारा।।
अँचरा डोलत पुरवाइया कस
मया दया कर किरवारा।
कोन तोर हारीहारा।।
गोड़ रंगें हे पिरित रंग ले।
माँग भरे चंदा तारा।
कोन तोर हारी हारा।।
गंध बसंती बगरावत हे।
खोली बखरी अउ ब्यारा।।
कोन तोर हारीहारा।।
शोभामोहन
०२/०२/२०२१
ब्रज भुँइया
भोले भंडारी, (कुकुभ )
1/
सोन झूलना
मखमल दसना, सुता सुनावत हे लोरी।
मया बँधाये महतारी
हर, झूला के तीरत
डोरी।।
2/
जइसे लेवइ
बछरू कोती, रँभावत गइया
जाथे।
तइसे कृष्ण ल
जसुदा मइया, छिन भर बर नइ अलगाथे।।
3/
जनमे जबले नाथ
त्रिलोकी, दरसन लालच मन छाये।
ब्रजभुँइया
भोला भंडारी , भेस भिखारी धर आये।।
4/
हरि दरसन बर रेंधत भोले, खड़े दुआरी नंदरानी
।
भोलेनाथ मनावत
कतको, अँडियाये बरजत खानी।।
5/
दान दिये हँव
तेला धरके, रस्ता नाप अपन जा तो।
नींद परे हावय
लइका के, तँय झन जादा चिल्ला तो।।
6/
जाननहार अगम
के कान्हा, गोड़ पटक रोवन लागे।
दँऊड़त हँफरत
महतारी हर, पाय दुवारी मा आगे।।
7/
पारब्रम्ह के
दरसन पाके, होगे हे गदगद
भोला।
सुमिरत हरि के
नाम निकलगे, कोनो न चिन्ह सकिस ओला।।
शोभामोहन
[02/09/19/ 21:16]
●नजर काकरो झन लागे (कुकुभ)●
फागुन महिना
कस संगी हर,
रंग भरे बर
जिनगानी ।
गोंटी मारे लहर बियाये,
थीरथार तरिया
पानी।।
रीतापन के राज
सिरागे,
जगमग होगे हे
आँखी।
नभ नापे बर मन
हंसा हर,
पाय सोनहा अब
पाँखी ।।
पग-पग अपटे
गिरे झपाये,
सब दुख पीरा
बिसरागे ।
अंतस निक्ता
मोल करे बर,
कोनो पहुना बन
आगे।।
ढ़ारत हे मकरंद
मया के,
बेंझा के झन
छलकाये ।
एक पेंड़वा दू
खाँधी अन,
बेरा हर झन
फलकाये।।
साँझर-मिंझरा
सुख-दुख होवत,
लटपट जेकर सुख
जागे।
आईजुई मनावत
हावँय,
नजर काकरो झन
लागे ।।
शोभामोहन
●चउमास घरी (कुकुभ छंद )●
सनन-सनन सन
मचलत पुरवा,
झुमरत पेड़ मगन
भारी।
मया मितानी
गोठ करे बर,
छछलत नार जबर
डारी।।
पेंड़ फोंक
कोंवर पाना मन,
नाचत झूमत
लहराये ।
दूल्हा डउका
असन लगत हे,
मूँड़ी मउर ल
खपवाये।।
गड़गड़ -गड़गड़
गरजत बादर ,
जइसे मंगल धुन
बाजे।
भुँइया गवनाही
कस लागे,
अंग-अंग गहना
साजे।।
उफनत छलकत
मटकत नदियाँ,
गिंजरत छेल्ला
दिन पाये ।
सागर सजन
बलावत हावय,
बिलमत नइ हे
बिलमाये।।
शोभामोहन
●सब काटत बेरा आरी (कुकुभ)●
छिन भर झेले
नहीं सकय दुख ,
तन ला चाही
सुखियारी।
भुला गये
गिंजरन घुमरन मा,
काकर करथन बनिहारी
।।
भुलन जड़ी ला
खुँद ड़ारे हे,
सार बात ला
बिसराये ।
सुख दुख के
निरवार करत हे ,
नत्ता मा जोरे
चटकाये ।।
चपकत उखरा पाग
ला बाँधे,
मीठ घलो होवत खारो ।
रचत हवय जंजाल
अरझना ,
अटघा करके
हजारों ।।
नाम छोड़ कुछु
काम न आवै,
मलकत ड़ोंगा
मँझधारी।
मन ला जग
सतरंग बलावत,
बेरा के चलत कटारी ।।
शोभामोहन
फागुन महिना कस संगी हर,
रंग भरे बर जिनगानी ।
गोंटी मारे लहर बियाये,
थीरथार तरिया पानी।।
रीतापन के राज सिरागे,
जगमग होगे हे आँखी।
नभ नापे बर मन हंसा हर,
पाय सोनहा अब पाँखी ।।
पग-पग अपटे गिरे झपाये,
सब दुख पीरा बिसरागे ।
अंतस निक्ता मोल करे बर,
कोनो पहुना बन आगे।।
ढ़ारत हे मकरंद मया के,
बेंझा के झन छलकाये ।
एक पेंड़वा दू खाँधी अन,
बेरा हर झन फलकाये।।
साँझर-मिंझरा सुख-दुख होवत,
लटपट जेकर सुख जागे।
आईजुई मनावत हावँय,
नजर काकरो झन लागे ।।
No comments:
Post a Comment