तिरिया सिखौना कवित्त
1/
भौरों कस भुनुन-भुनुन कर नर हर,
रूप रंग देखके लुढ़ारे बर आय रे ।
उड़ियात तितली असन देख आँखी फूँटै,
मया मया कहै पाँखी टोर के मड़ाय रे ।
झालापाला ओढ़ना पहिर झन ओढ़ झन,
हाट गली खोर तन आँखी गड़ीयाय रे ।
बेर हर अलहन गोड़ ला मड़ावै चुप,
गउ कस हवस तोला नइ ममहाय रे ।
2/
ताकत हवय कतकोन झन तोर चाल,
हब ले काँटा हा कहूँ झन तो गोभाय रे ।
दुख न अभरै मोर सोन के चिरइया ला,
दाई मन मानै नहीं संसों बड़ खाय रे ।।
रंग झन उतरय, पर झन कुतरय,
भेजके अकेल्ला तोला जीव कठवाय रे ।
जात हे अबड़ बिखहर मनखे के सुन,
फोर कइसे कहौं समझ नइ आय रे ।
शोभामोहन
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