( शिखरिणी छंद )
(छत्तीसगढ़ी )
"कहाँ जाबे हंसा"
फरे फूले डारा , चलत सब मारे लपक के |
झरे हो ते बारी , चुरगुन न देखे हिरक के ||
बडा बैरी बेरा समझ झन संगी गदक के |
सबो पीरा पाथे , धर मनुख चोला भटक के ||
कहाँ जाबे हंसा ,सब डहर बांधे तन धरे |
कहूं कोती जाबे ,भटक भरमाबे भय भरे ||
भरोसा ले जीबे ,जपत रहि रामा धुन धरे |
बताये रद्दा ला ,बस जगत में वो गुरु हरे ||
शोभामोहन श्रीवास्तव

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