1 / पबरित भुँइया (जसगीत)
पबरित भुँइया के जस गावौं।
मैं नाचौं झुमर लहस जावौं।
जब जब मैं ये जग में आवौं।
ये भुँइया के कोरा पावौं।।
मय करत हौं जेखर चारी रे ।
ओ हा छत्तीसगढ़ महतारी रे।1।
इहाॅं बेद पुरान हे गीता हे।
इहाॅं रामायन के सीता हे।।
इहाॅं सुख नानिक एक बीता हे।
अउ लइकामन जगजीता हे।।
झलमल सतरंगी कोरा रे।
जेला कहिथें धान कटोरा रे।।2।।
इहाँ बेटा मन अवतारी कस।
इहाँ बेटी मन महतारी कस।।
इहाॅं पग पग देबी देवता हे।
सबला साखी बर नेवता हे।।
इहाॅं दया धरम के बाती रे ।
बरथे घर घर दिनराती रे।। 3।।
इहाॅं आगू सूरूज के घाम आथे।
सबरी मेर राजा राम आथे।।
इहाॅं सब झन सबके काम आथे।
इहाॅं सबके नाम में राम आथे।।
मैं उहाॅं के औं रहवासी रे।
जे खाथें भाजी बासी रे।।4।।
इहाॅं सबला सादापन भाथे ।
इहाॅं परदेसी आदर पाथे।।
इहाॅं देसधरम बर मर जाथें
इहाॅं किच्चक अजामिल तर जाथें ।।
सब डहर मया के खेती रे।
जेती बर जाबे तेती रे।।5।।
इहाँ मधुरसघोरे बानी हे।
इहाॅं राम किसन के कहानी हे।
घर घर तुलसी महरानी हे।।
सुन्दर कबि के रजधानी हे।
अरपा पैरी के रानी रे।
ये महानदी के पानी रे ।।6।।
इहाँ पग पग गौराचौंरा हे ।
इहाॅं गेंड़ी बाॅटी भौंरा हे।।बनिहारिन भिरे कछोरा हे।
तब हरियर दाई के कोरा हे।।
जिहाँ धरती अटल एहँवाती रे ।
मैं वो सुखबिरछा पाती रे।।7।।
बिटिया बर तीजा पोरा हे।
भाई बर रेशमडोरा हे।
भौजी बर पैरी तोड़ा हे।
अउ मया केे सब गंँठजोरा हे।।
चरचर ले फुले फुलवारी रे।
छराछीटा दिये दुआरी रे।।8।।
इहाॅं सरगी तरिया सरार हवय।
अमरैया खेती खार हवय।।
इहाँ मया पीरा के चिन्हार हवय।
इहाँ रोज के रोज तिहार हवय।।
इहाँ खोर दीया अउ बाती रे।
बरथे घर-घर संझाती रे।।9।।
इहाॅं निमगा हीरा खदान हवय।
इहाॅं जंगल के बरदान हवय।।
लोहा पथरा पहिचान हवय।
सबके हिरदे भगवान हवय।।
लइका ला दिये सुख सारी रे।
छाहित हे मोर महतारी रे।।10।।
इहाॅं कहीनी ढोला मारू हे।
अउ लोरीेकचंदा मयारू हे।।
इहाँ कर्मा अउ ददरिया हे।
राउतनाचा लठधरिया हे।।
पंडवा के कथा कहानी रे।
तीजन ला हवय जबानी रे।। 11।।
इहाॅं अकती के रंगझाझर हे ।
इहाॅं तुतरू दफड़ा मांँदर हे।
इहाॅं मनखें एक मन आगर हे।।
इहाॅं लाहो लेवत जाॅंगर हे।।
बिटिया के होत सवाँगा रे।
भले कतको मूड़ में लागा रे।। 12।।
इहाॅं जगमग जोत जँवारा हे।
माता सेवा के जयकारा हे।।
इहाॅं पंगत बइठथे झारा हें।
सुनता ले चलत गुजारा हे।।
टींवा ले इहाॅं सुख माते रे।
हाँसत दिन गावत राते रे।।13।।
छितका में रहै महरानी कस।
बूता में पेरावै घानी कस।।
सुनता में समावै पानी कस।
चऊमास तनाय पलानी कस।।
अइसन छत्तीसगढ़ नारी रे।
मैं जाँव वोकर बलिहारी रे।।14।।
इहाँ किसम किसम के ओन्हारी हे।
उम्हियाये बखरी बारी हे।।
चुकछोहर परे ओसारी हे।
कोठा कुरिया हे झिपारी हे।।
जिनगी के सुख मनमाना रे।
इहाँ बात बात में हाना रे।।15।।
मन मया दया सनमान भरे ।
अंतस भीतरी भगवान धरे।।
बेवहार करे बर नइ चूकै।
भले भाग ला निचट उतान परे ।।
चूल्हा के रहे ले उपासी रे ।
इहाॅं आड़ परै नहीं हांँसी रे।।16।।
रीस करै न सुख के नांँगा में।
पटका पतलून सवाॅंगा में।।
धरती ले सोना उगलाथे।
जग ला अन देके सुख पाथे।।
ते सेती छत्तीसगढ़िया रे।
कहलाथे सबले बढ़िया रे।। 17।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
जय छत्तीसगढ़
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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