Wednesday, 15 March 2023

लावणी छंद

 

भूख बिगारी करके आगे
अउ अघाय अँटियावत हे ।
बेरा के बैरागीपन हर
तीनो तिलिक झँकावत हे ।

 

देह मा नरगर गहना लादे, भीतर के सिंगारी बिन ।
पूरा जिनगी आधा होगे , अंतस के किरवारी बिन ।।

 

1/

कलसा कहूँ सजावत हे तव,दियना कहूँ जलावत हे ।

पँवदर फूल दसावत हावय, पंखा कहूँ झलावत हे ।।

2/

धान डँगाली झुम्मर झालर,खेत-खार सुख झारत हे ।

फूल पान पंखुरी पंखुरी, हाँसत बदन जोहारत हे ।।

 

 

 

 

आगी खुँदके आवत हँव

 

बेरा के रथ खरखर खरखर

तीरत हवय तिरावत हँव ।

गरब बढ़त हे मास चढ़त हें

साँसा संग खिरावत हँव ।।

बेरा मोला टिहिरियात हे

बेर ल मै बिजरावत हँव ।

माटी के सब अनगढ़ मूरत,

देख देख बउरावत हँव।।

पबरितपन के परछो झन ले,

आगी खुँदत आवत हँव।

जोंख असन जीयत भर चूसे,

अतंसझोर भुलावत हँव।।

पाला परे फसल के जइसे,

छिंही-बिंही हो जावत हँव।

मुँह उलाये बर नइ जानँव,

करजा चुपे चुकावत हँव।।

शोभामोहन

 

 

 

 

बैरी करम जनावत हे

 

उम्मर के चंदन लकड़ी हर

घँस-घँस मोर सिरावत हे ।

लाग-नता के गोठ बात मन,

आँके असन पिरावत हे ।।

पर के आँखी झन पतियाबे,

मोर जनास बतावत हे ।

बैरी हितवा कोनो नइ हे,

बैरी करम जनावत हे ।।

शोभामोहन

 

 

 

 

फगुआ आवत ढोल बजावत,

अउ सजना नइ आवत हे ।

बनिहारी के पुरती होके,

जीव हमर दुख पावत हे ।।

माते कस फगुनाय बयारी,

बिरहागी दहकावत हे ।

शोभामोहन

 

 

 

लावणी छंद

बिलमत बिलमत जनम पहाये, चोला बागी लागत हे ।

तोर मेर अभरे ले चूके,गोड़ अभागी लागत हे।।

राग रंग दहरा मा बूड़े, मन मा आगी लागत हे ।

छटपट छटपट तहल बिकल ये,जीव सरांगी लागत हे ।।

शोभामोहन

३०/११/२०२०

 

 

भागत भादो अउ धरनीतल (लावणी)

सावन भादो बरसिस झमझम,गद हरियर होगे धरती।

काँसी फूलत हे चरचर ले,मेड़ पार हाँसत परती।

डड़ियावत धनहा डोली अब ,लगथे भारी पाँव सही।

आस छिंचाये हवै खार मा,जीव लगे हे दाँव सही।

बादर लहुटे जोरत-जोरन,नभ मा रचत पहाड़ वही।

लहुट-लहुट के देखै हाँसत,बन काँदी हे आड़ कहीं।

मुँह लुकात लजा भुँइया हर , नार पान ले झाँकत हे।

जावत देखत रंँगरसिया ला, दिखत तिहाँ तक ताकत हे।।

शोभामोहन

 

 

छत्तीसगढ़ महतारी वंदना लावणी
1/
चुकचुक ले हरियर हे लुगरा, माँग भरे हे चरचर ले ।
पैरी तोड़ा बिछिया जोड़ा, गहना पहिरे नरगर ले ।।
2/                           
पटा पछेला बहुँटा करधन, चूरी पहिरे बाँही भर ।
सूँता पुतरी मोहर सुर्रा, दुलरी-तिलरी अनगिन लर।।
3/
अँगुठाही अउ पहुँची मुँदरी, खिनवा फुल्ली सोन सुघर ।
सब सिंगार ला करके बइठे , छत्तीसगढ़ महतारी हर  ।।
4/
एक हाथ मा धान के बाली, एक हाथ हँसिया हावय ।
का मंडल बनिहार व कमिया, गीत सबो ओकर गावय ।।
शोभामोहन
[21/09, 10:41]

 

जय जय जय भोले शंकर लावणी
1/
जयजय जयजय भोले शंकर, जग के गोसइया  हरहर।
उमापति कैलाशी जगधर,बबम-बबम-बम गंगाधर ।।
जयजय जयजय भोले शंकर.................
2/
तोर उघारत तीसर आँखी, रतिपति बरगे भर-भर-भर।
गर करैत डोमी के माला, रेंगत हावय सर-सर-सर।।
जयजय जयजय भोले शंकर...................
3/
हवय बिराजत चंदा मस्तक, गंगा जटा झरत झरझर ।
शंकर करे अपावन पावन, अंग-अंग मा राख चुपर ।।
जयजय जयजय भोले शंकर...................
4/
तँय संहार सृष्टि के करथस, ताण्डव नाचत डमरू धर ।।
तोर दुवारी नंदी बइठे, टहल करत अउ गौरी हर ।
जयजय जयजय भोले शंकर.................

शोभामोहन

 

नवा बहुरिया सजन सँवरिया (लावणी छंद )

 

नवा बहुरिया सजन सँवरिया,संग कमाये जावत हे।

छन-छन-छन पैजन छनके ले, मंगल सगुन जनावत हे ।

फुलकारी होये लुगरा के,हे अँचरा झलझल-झलमल ।

महर महर ममहावत हावय, हाँसत हे खलखल खलखल।।

खन-खन-खन चूरी खनकावत, अंतस ला झनकावत हे ।

नवा बहुरिया सजन सँवरिया, संग कमाये जावत हे।..(१)

पाटी पारे सेंदूर डारे, जावत हे झरफर-झरफर ।

मन मन अबड़ मगन इतरावत,अँचरा लहरा फर-फर-फर ।।

चम-चम-चम बिंदिया चमकावत, बोलत मन हरसावत हे ।

नवा बहुरिया सजन सँवरिया, संग कमाये जावत हे...(.३)

संग केशरी अंग बसंती, रंग सजे सतरंग सुघर।

दहकत परसा असन महाउर,पाँव सजे साँटी लरलर ।

बिछिया चुटकी अउ अँगुठाही,घाँठा मरत पिरावत हे।।

नवा बहुरिया सजन सँवरिया, संग कमाये जावत हे...(.३)

चढ़े चुक्क ले रंग मेंहदी, हाथ गदेली फूल असन।

बज्र कुदारी बेंठ धराये,गदगद हे मुहरन परसन।।

मिरगी जइसे नैन बरत मुख,ढ़ाकत मूड़ लजावत हे।।

नवा बहुरिया सजन सँवरिया, संग कमाये जावत हे...(.४)

शोभामोहन श्रीवास्तव

१०/०१/२०२१

 

 

 

लावणी छंद अभ्यास
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नइ जानँव
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1/
मोर मुँहाटी बिन फरिका के,परदादारी नइ जानँव ।
ठाढ़ होय बर ठउर नहीं हे, कोला-बारी नइ जानँव ।।
2/
पेट भरे ले पीठ उघरथे, दुनियादारी नइ जानँव ।
बूता ले उसवास नहीं हे, चुगली चारी नइ जानँव ।।
3/
उसना डबका भाग लिखाये, खीर सोंहारी नइ जानँव ।
जिनगी चलत उधारी बाढ़ी, मैं हुसियारी  नइ जानँव ।।
4/
अरबन-चरबन तेल -फूल नइ, रोग अजारी नइ जानँव ।                                                                    बूता संगी साथी मितवा, जग हितवारी  नइ जानँव।।


लावणी छंद
1/
तैं ममहाती कली कुँवारी,अउ मैं जुन्ना पत्ता अँव।।
तैं बिन मँगनी होये टूरी, अउ मैं उसले सत्ता अँव ।।
2/
ऋषि-मुनि के गढ़े श्लोक तैं, मैं ठलहा चरबत्ता अँव ।
तैं कोरवान ओढ़ना अउ मैं, जुन्ना कपड़ा लत्ता अँव।।
3/
तैं मंडल के राजभोग मैं, ररुहा के दरभत्ता अँव।
नहीं चँदैनी मैं चरदिनिया, बेरा जइसे खत्ता  अँव ।।
4/
मै किसान के नागरजोत्ता, बइला अर्रा-तत्ता अँव ।
नेवरनीन नवा नखरेली, खाल ओदरे नत्ता  अँव ।।

गौरी पूत दुलरवा गनपति ,आवव रिद्धि-सिद्धि धरके ।
बिघन बिपत अल्हन ला टारव, मंगलमूर्ति दया करके ।।
2/
लीप दुवारी घर अउ अँगना , गंँठियारी दूबी खनके ।
फूलपान के थार सजावंँव, हरदी के गाँठी गनके।।
3/
पान सुपारी नरियर लानँव, चाँउर पिंयर रंग सने ।।
तूस ओढ़ना मा पधरा के, रोली टिपका डार बने ।।
4/
भरके गंगाजल लोटा मा, आमा पान मड़ाये हँव ।
चउँक पूरके रखके पिढ़वादीया कलश चढ़ाये हँव  ।।



लावणी छंद अभ्यास
1/
सावन भादो बरसिस झमझम, गद हरियर होगे धरती ।
काँसी फूलत हे चरचर ले, मेड़ पार हाँसत  परती ।
2/
डड़ियावत बाली डोली मा , लगथे भारी पाँव सही।
आस छिंचाये हवय खार मा, जीव लगे हे दाँव सही।।
3/
बादर लहुटे जोरत जोरन, नभ मा रचत पहाड़ वही।
लहुट-लहुट के देखत हाँसत, बन काँदी हे आड़ कहीं  ।।
4/
मुँह लुकात लजा भुँइया कभू , नार पान ले झाँकत हे ।
जावत देखत रंँगरसिया ला, दिखत तिहाँ ले ताकत हे ।।

[25/09, 16:03] Mohan Srivastava Poet: 1/

: लावणी छंद अभ्यास
1/
सावन भादो बरसिस झमझम, गद हरियर होगे धरती ।
काँसी फूलत हे चरचर ले, मेड़ पार हाँसत परती ।
2/
ड़ंड़ियावत बाली डोली मा , लगथे भारी पाँव असन।
आस छिंचाये हवय खार मा, जीव लगे हे दाँव असन।।
3/
बादर लहुटे जोरत जोरन, नभ मा रचत पहाड़ असन।
लहुट-लहुट के देखत हाँसत, बन काँदी हे आड़ असन ।।
4/
मुँह लुकात लजा भुँइया हर, नार पान ले झाँकत हे ।
जावत देखत रंँगरसिया ला, दिखत तिहाँ तक ताकत हे ।।
[24/09, 19:07] Mohan Srivastava Poet: 1/

 

गौरी पूत दुलरवा गनपति ,आवव रिद्धि-सिद्धि धरके ।
बिघन बिपत अउ अलहन टारव, मंगलमूर्ति दया करके ।।
2/
लीप दुवारी घर अउ अँगना , गंँठियारी दूबी खनके ।
फूलपान के थार सजावंँव, हरदी के गाँठी गनके।।
3/
पान सुपारी नरियर लानव, चाँउर पिंयर रंग करँव ।।
तूस ओढ़ना मा पधरा के, रोली टिपका टीप डरँव ।।
4/
भरके गंगाजल लोटा मा, आमा पान मड़ाये हँव ।
चँउक पूरके मड़ा पिढ़वा, करसा दिया चढ़ाये हँव  ।।

 

लावणी छंद  शिव स्तुति
1/
जयजय जयजय भोले शंकर, जग के गोसइया  हरहर।
देंह देव अउ भिन्ना जग के , दुख ला टारे  गंगाधर ।।
जय जय जय भोले शंकर.................
2/
तोर उघारत तीसर आँखी, रतिपति बरगे भर-भर-भर।
गर करैत डोमी के माला, रेंगत हावय सर-सर-सर।।
जय जय जय भोले शंकर...................
3/
हवय बिराजत चंदा मस्तक, गंगा जटा झरत झरझर ।
शंकर करत अपावन पावन, अंग-अंग मा राख चुपर ।।
जय जय जय भोले शंकर...................
4/
सृष्टि ल खपले लहुटाये, ताण्डव नाचत डमरू धर ।।
तोर दुवारी नंदी बइठे, टहल करत अउ गौरी हर ।
जय जय जय भोले शंकर.................

 

जेकर रुख पहरिया हावय

फूल पान हरायावत हे।

पानी मा निहार के मुहरन

ड़ोगर बड़ इतरावत हे ।

आँखी भर देखत हे तन ला

हिरदे भाव लुकावत हे ।।

आखर के समिधा देवत हँव,

तोला कोन बतावत हे ।।

अँधियारी हर संग धरे तब,

मन अंजोर लुहावत हे ।।

शोभामोहन

 

भीतर बिखहर बाहिर कोंवर

भेस बदल भसकोलत हे ।

आँखी के नुनछुर पानी मा

तँउरत सपना तउलत हे।।

शोभामोहन

 

छत्तीसगढ़ महतारी वंदना (लावणी)

चुकचुक ले हरियर हे लुगरा,

माँग भरे हे चरचर ले।

पैरी तोड़ा बिछिया जोड़ा,

गहना पहिरे नरगर ले।।

पटा पछेला बहुँटा करधन,

चूरी पहिरे बाँही भर ।

सूँता पुतरी मोहर सुर्रा,

दुलरी-तिलरी अनगिन लर।।

अँगुठाही अउ पहुँची मुँदरी,

खिनवा फुल्ली सोन सुघर ।

सब सिंगार ला करके बइठे,

छत्तीसगढ़ महतारी हर।।

एक हाथ मा हँसिया हावय,

धान बाल हे हाथ दूसर ।

का मंडल बनिहार व कमिया,

गीत सबो गावत ओकर।।

शोभामोहन

 

मीरा कस सब जहर घुटक ले

अमरित ला अभराये बर ।

कोंँवर भाव जगा ले अंतस

अगम गाँव मा जाये बर ।।

सपना के पाछू सपना हे,

जा झन थाह लगाये बर ।।

पाप पुन्य ला झन तउले कर,

होती ले लकठाये बर ।।

सुख दुख दूनो जरोंधा हावय,

अब तो तज परघाये बर।।

अपन होय के मरम ल जाने,

भीतर थाह लगाये बर ।।

शोभामोहन छेल्ला हो जा,

सँउक साध अलराये बर ।।

माँज भजन ले अंतस खोली,

चकचक ले उजराये बर ।।

शोभामोहन

३०/११/२०२०

 

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