चलै धर सार (मोतीदाम छंद )
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मिले जब पाँच
परान अधार।
खिले जग मा कर
रूप सिंगार।।
सहे दुख झेल झपेट
अपार।
रहे नभ खार
चलै धर सार ।।
रमैं नहीं जीव
कभू जग लंग ।
उड़ै बन हंस
अगास असंग ।।
तजै जग पाँच
पदारथ भार ।
सबो ल बिसार
चलै धर सार।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
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