पेंच अनगिन ठन फँसे हे
पेंच अनगिन ठन फँसे हे।
फूल मा काँटा हे अरझे,
देखथौं जब बाग म
पेंच अनगिन ठन फँसे हे,
ये जगत के लाग मा।।
हे अबड़ बकवाय देखौ,
जे डहर तेती
गड़ी।।
पाँव मा बेली
बँधाये,
हाथ मा अउ
हथकड़ी।।
आन सुर हे ताल आने,
गात आने राग मा।
पेंच अनगिन ठन
फँसे हे.......
खाय सूती
जेकरे तैं,
वो पलटगे आज
हो।
बेर मारत हे
झपट्टा,
रूप धरके बाज हो।
रूप चीखथौं टोर्रठ असन,
घुरगे मया के पाग मा।।
पेंच अनगिन ठन
फँसे हे.....
देख आँखी सहि न जावत,
रूप रंग तिहार
ला।
एक जइसे लेख
डारत,
हे सबो दिन
बार ला।।
जग मरत सोलह कला के,
चन्द्रमा के दाग मा।
पेंच अनगिन ठन फँसे हे.......
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२१/०५/२०२१
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