Friday, 15 July 2022

पेंच अनगिन ठन फँसे हे

 पेंच अनगिन ठन फँसे हे 


पेंच अनगिन ठन फँसे हे। 

फूल मा काँटा हे अरझे,

देखथौं जब बाग म

पेंच अनगिन ठन फँसे हे,

ये जगत के लाग मा।। 


हे अबड़ बकवाय देखौ,

जे डहर तेती गड़ी।।

पाँव मा बेली बँधाये,

हाथ मा अउ हथकड़ी।।

आन सुर हे ताल आने,

गात आने राग मा।

पेंच अनगिन ठन फँसे हे....... 


खाय सूती जेकरे तैं,

वो पलटगे आज हो।

बेर मारत हे झपट्टा,

रूप धरके बाज हो।

रूप चीखथौं टोर्रठ असन, 

घुरगे मया के पाग मा।। 

पेंच अनगिन ठन फँसे हे..... 


देख आँखी सहि न जावत,

रूप रंग तिहार ला।

एक जइसे लेख डारत,

हे सबो दिन बार ला।।

जग मरत सोलह कला के

चन्द्रमा के दाग मा।

पेंच अनगिन ठन फँसे हे....... 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२१/०५/२०२१

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...