नयन मूंँदने से भीतर मावस मिल जाता रे ।
सोच प्रकृति से अपना कितना गहरा नाता रे ।।
नभ गंगा में जब रवि शशि और
ज्योतिर्मय मंडल तारा ।
तमस प्रेम अभ्यस्त मन सदा
फिरे भटक मारा मारा ।।
आँख ढ़ग से गर मूँदे पर्दा मैं खुल जाता रे ।
नैन मूंदने से भीतर मावस मिल जाता रे ।।
कुछ भी नहीं अकेला जग मग
राम गढे सबकी जोड़ी ।
अंधकार भी नहीं अकेला
कोशिश हो जाये थोड़ी ।।
जोगी जोग रमाता जो जगमग पाता रे।
सोच प्रकृति से अपना कितना गहरा नाता रे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
२६/१०/१७
झीट दुर्ग
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