हर एक भुवन तेरा लगता है
पवन छुए या किरण छुए तन
हर एक छुवन तेरा लगता है ।
जबसे प्रीत घुली साँसों में,
हर धुन रटन तेरा लगता है ।।पवन छुए या
मेरे हठ ने पाँव पकड़कर,
रोक लिया तुमको जाने से ।
जीवन लगा सुलझने मेरा,
तुमको ऐसे उलझाने से ।।
शीष झुकाऊँ अब जिस दर पे,
हर एक भुवन तेरा लगता है ।।पवन छुए या
मेरे बंजारे धड़कन को,
कैसा लगन लगाया तुमने,
हिय की लहरे तन तट आयी,
गीत कोई जब गाया तुमने,
मेरे बैरागी अंतस का,
सारा सृजन तेरा लगता है।। पवन छुए या
जिन अनचीन्हे पदचापों की,
ध्वनियों पर ये कान लगे है ।
अनुभव ने समझाया हमको,
जगत पराया आप सगे हैं ।।
हे आकुल प्राणों के अतिथि,
ध्वनि शुभचरण तेरा लगता है ।। पवन छुए या
तेरी चौखट रोज जलेंगे,
सांध्यदीप बन गोधुलबेला,
बेचैनी की उमर घटा दो,
घबराता है प्राण अकेला।।
सुध ले लो तपसी भावों का,
अनहत जपन तेरा लगता है ।। पवन छुए या
पलकें झुककर मृदु भावों से,
अभिनंदन कर करके जाती ।
अंतस के कोमल भावों को,
धड़कन गुंजारित कर जाती ।।
अब तो रूकना झुकना चलना,
सब कुछ नमन तेरा लगता है ।। पवन छुए या
शोभामोहन श्रीवास्तव
०९/०३/२०१६
राजिम
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