Tuesday, 21 July 2020

कहते हो शब्दों संग करती रंगरैली हूंँ।
मैं सृष्टि के पार अगम अनहत गैली हूँ ।।
निद्रालय में जागृति की संतोष परम मैं
प्रभु के प्रभुता की साक्षी का घोष चरम मैं।।
लोकप्रवाह प्रबल में अटल अकंटक हूँ मैं ।
रागरहित चेतनता प्रहरी अपलक हूँ मैं।
कालखंड में रहकर सदा अखंडित हूँ मैं।
ज्योतिर्मय दैदीप्यमान अमंडित हूँ मैं ।।
अवचेतन के मोक्षमहल में तपरत हूं मैं ।
निष्प्रकंप परमेश लीन हूँ अनहत हूँ मैं ।।
एकलगामी पंथ चरम जीवनशैली हूँ ।
कहते हो शब्दों संग करती रंगरैली हूँ ।।
रम्य अरम्य मोहमय मादक पंथपार मैं ।
मानव सरि सुख दुख जनक स्पर्शधार मैं ।।
काम सुकाम कुकाम न कृत्य अहोमय हूँ मैं ।
पुनरावर्तन परे परम आनंदलय हूँ मैं ।।
तप्त रागमय सब उतार भवपार चली मै ।
अनुरागो की दुसह वेदना पार चली मैं ।।
तन अदम्य हो चुके भाव की परिभाषा मैं ।।
कृत प्रतिकूल विसर्जित ताल अमग श्वाँसा मैं ।।
सुख विलासिता लाँघ बढ़ी अलबेली हूँ ।
कहते हो शब्दों संग करती रंगरेली हूँ ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०९/१०/१७
झीट पाटन दुर्ग छ.ग.

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