Monday, 22 June 2020

पसर भर पानी

1/छत्तीसगढ़ी साहित्य पुरोधा पं. सुंदर लाल शर्मा ला
पसर भर पानी
लिखेरी *शुभ चन्द्रसूर्या *
*दोहा*
ईश्वर साखी जान के, कहिनी सुंदर लाल।
कहत हवँव सक जोरके, तीनो पन के हाल।।
*
पीतर पुरखा डीह अउ,सुमिरँव गुरु महराज।
मोला अड़हा जानके, होव सहाई आज ।।
*
हरबोला जइसे सदा, जेकर गुन जस गाय।
रोय गाय हाँसै भले, पूछे नहीं बताय ।।
पूछे नहीं बताय, अकेल्ला बइठे बोलय,
नइ अंतस के गाँठ,कभू ककरो मेर खोलय।
कोनजनी का दुख, सतावय भीतर ओला ।।
भिनसरहा ले मोर, बबा बोलय हरबोला ।।
*
डोला बोहे आत हें, चन्द्रसूर गाँव कहार ।
अगवानी दाई करे, बइठे साजे थार ।।
*
उल्लाला
*
नवा बहुरिया आत हे, लछमी असन जनात हे ।
जम्मो झन हरसात हें,हियसुख नहीं समात हे।।
बेरा बीतत जात हे, सुख बाढ़त दिन-रात हे।
हाँसी ठट्ठा बात हे, घर अँगना ममहात हे ।।
*
गीतिका
*
साँझ बिहिना लाल सेंदुरी,बेर बीतत हाँस के
हें मिले संगी जँहुरिया, एक गुन एके रास के ।
होत हे बड़ रंगरेली, मनमिलौना ठाँव मा
सुख सुभीता डहर चारो, हे पिया के गाँव मा।।
*
आल्हा
*
देवमती अड़बड़ गुनवंती,वेद शास्त्र के जानै बात ।
जान सुवारी के गुनदल ला,जियालाल मनमन हरसात ।
नेम धरम मा रहय पगाये,दूनो नवा बहुरिया प्रान ।
सास-ससुर मन जेला राखै, आँखी के पुतरी कस जान ।।
दूनो बहुरिया कोरा सुन्ना, देख सास के मुँह अइलाय।
बिधना ले लड़ कोन सके हे, गुनत घुना अउ काँड़ा खाय ।।
देवमती भिनसरहा उठके, पूजा पाठ करै मन लाय।
करै उपास तपावै तन ला, पाख म पाँचे दिन अन खाय ।।
घर तो घर अब तो बाहिर मा, फुसुर-फुसुर सब झन गोठियाय ।।
नामी बैकुंठी मंडल घर, दू ठन हवय पतोहिया आय।
बच्छर बच्छर बीतत हावय, कइसे सोहर नहीं सुनाय ।।
जइसे-जइसे दिन पहावत, घर भर सबला संसो छाय ।
अपन माथ के करमलेख ले, दूनो पतोहिया जब गे हार ।।
दई देवता ला सुरता करके, रो पारिन एक दिन घोक पार ।।
*
सोरठा
होइन अँगना ठाढ़, आके संत सुजान तब।
करे वंश बढ़वार, अरग दिये दिनकर कहिन ।।
*
चौपाई
*
संत पधारे के सुन बोली।
सास दँउड़त निकलिस खोली ।।
बेटा ला लगिहात बलाथे।
संत गोड़ छू पाँव पराथे ।।
सुरुज मनाये मन मा ठानी।
देवमती सन तन मन बानी।।
भिनसरहा ले नदिया धावैं।
कनिहा भर पानी बूड़ जावैं ।।
अरग देत दिनकर ला पूजैं।
जब्बर करमलेख ले जूझैं ।।
असकुस होथे दिन चढ़ जाथे।
राम भरोसा बेर पहाथें ।।
शास्त्र उपनिषद दाई बाँचे।
सुन -सुन भीतर लइका नाचै ।।
*
कहरवा
*
रचथे सबला एक रचइया।
शुभगुन दाई फेर धरइया ।।
जइसन दाई तइसन लरिका।
होथे जस घर तइसन फरिका ।।
*
कुंडलिया
*
आठ महीना पूरगे, टूटिस हवय करार।
बेसन मूड़ी डारके, ओली भर बइठार ।।
ओली भर बइठार, लगाइन गोड़ महाउर।
साज कलेवा थार, परूसिन हावय गुरतुर ।।
पल पल जबर जनात, अगोरा करके जीना ।
नौ के परगे छाँव, पूरगे आठ महीना ।।
*
सोरठा
*
बेरा नहीं पहात, धुकुर-पुकुर मन होत हे ।
जबर पूस के रात, पीरा उठत प्रसोत हे ।।
*
रूपमाला छंद
उठे हे परसोत पीरा, जेन सहि नइ जात ।
सास कहत सुइन लाने, जाय बर लगिहात।
छटपटावत हे पतो हा, हड़बड़ावत सास।
फूल फुलत जान अँगना,मन मा हुलसत खास।
डीह ड़ोगर देव सत्ती, बदत बदना जात ।
घटोरिया दाई मनावत, अउर शीतला मात।
सुइन आवत झरफरावत, भिर कछोरा फेर ।
तात पानी लान कहिथे, अब न लागै बेर ।।
*
मत्तगयंद
पूस अमावस के दिन सुंदर, देवमती हर पाइस लाला ।
बाहिर बाप बड़ा मन हाँसत, भीतर रोवत कुल उजाला ।
देह दशा नइ हे बुध औ सुध, पूरत हे सुख साध निराला ।
ओ छिन के सुख भाव बखानन, आखर हे न बतावँव काला ।
*
दोहा
*
कोठी ले तब लानथे, सूपा भरके धान ।
लइका ला ओमा मड़ा, करथें अड़बड़ दान ।।
*
शिखरिणी
*
बड़े दाई बाबू , अबड़ सुख पाये मगन हें।
सबो के आँखी मा, झलक सुत पाये लगन हे ।
नहा धोवा लाला, सुइन सिपचाये अगन हे ।
बबा छाती फूलो, लगिस मनमाने ठगन हे ।
*
दोहा
*
एक झलक तो देख लौं, नाती ला दौ लान।
अउ कतका बेर लागही, देखे छुटत परान ।।
*
कहरवा
*
आँखी फूटत रहीस हमर तो,
तोर दरस बर दादू भइया।
आड़ी-पूँजी जिनगी भरके,
करँव निछावर फेर बलइया ।
मोर कुल के हे माथा चंदन,
डीह म मोर अँजोर करइया ।।
मोर उमर तोला लग जावय,
रे मोर अँगना जनम धरइया ।।
*
दोहा
*
हे देवी कुल देवता, होव सहाय पिलोर।
जेकर परसादे हमर, आँखी भइस अँजोर ।।
*
आल्हा
*
बाप-बड़ा अउ बबा सबो झन, सुख के मारे हें बइहाय ।
पोथी पतरा देख ताक के, शुभ नक्षत्र बता हरसाय ।।
देवत अँजवाइन के धुँगिया, महर-महर घर हर ममहाय ।
देवमती हर लइका कोती, देखत मया भरे मुस्काय ।।
बनिहारी पाये बनिहारिन, कस आँखी संतोष जनाय ।
नोहर के सोहर का कहिबे, सुख करार हर कहे न जाय।।
*
गीतिका
*
गाँव के सोहर गवइया, सुन खबर ला आत हें
देखके लइका ल सुंदर, रूप ला सिसियात हें।
पाँव भुँइया नइ परत हे, आज बड़का बाप के
झूलना तुरते बनाये, बर कहत हे खाप के ।।
*
लावणी
*
झबला कोंवर सूतीं सीले, दरजी ला बलवावत हे ।
कोनो सेकत चुपरत हावय, चूम उठावत पावत हे ।
कोनो नहाय तिपोवत पानी, कोनो डीठ उतारत हे ।
कोनो पहुना-पही नेवते, अउ मनगनित बिचारत हे ।
*
चर्चरी
*
छट्ठी के नेग जोग, भवन गजगजाये ।
साँवर नाउ बनात, घर भर सब नख कटात।
जुरत हें मया जमात, जम्मो नेवताये ।
छट्ठी के नेंग जोग, भवन गजगजाये ।।
नाउन देवत बलाव, गिंजरत नइ थकत पाँव।
माते सुख मगन गाँव, सब झन हरसाये ।
छट्ठी के नेंग जोग, भवन गजगजाये ।
गड़वा बाजा बजात, तुतरु मोहरी सुनात।
कोईली ला तक लजात, सोहर तिय गाये ।।
छट्ठी के नेंग जोग, भवन गजगजाये ।
काँके कोनो चढ़ात, कोनो लाडू बनात ।
रीता नइ ककरो हाथ, सबो हें जिहाये ।।
छट्ठी के नेंग जोग, भवन गजगजाये ।
चन्दरमा ल पहिनात, झबला डोरी बँधात ।
काजर फूफू लगात, नेग गजब पाये ।।
छट्ठी के नेंग जोग, भवन गजगजाये ।
लुगरा अउ चाँदी सोन, अउ मन मा चाह जौन।
सुख आगू चीज कौन, पसर भर लुटाये ।।
छट्ठी के नेंग जोग, भवन गजगजाये ।।
*
द्रुतविलंबित
*
गमक आवत बाँधत ढूँड़ही।
मगन हाँसत गावत बुड़ही ।।
अबड़ आगर घीव ल डार के ।
मिंजत अउ खुरहेरी ल गार के ।।
*
आल्हा
*
छै दिन मा छट्ठी करवाये, नौ मा अउ कराय दसठान ।
बारा दिन मा बरही करके , एकइसा मा भीतर लान ।।
लइका मेर सबो झन झूमे, मया करय अहलाद लुटाय ।।
सुख के दिन बासर आये हे, बैकुंठी दुख गइस पराय ।।
*
दुर्मिल सवैया
*
बड़ सुंदर हे बड़ चंचल हे, मनभावन पावन फूल फुले ।
पुरगे सब आस दबे मन के, बस रूप लला नयना म झुले ।
झबला कुरता कवनो पहिना, सब रंग फबे सब रंग खुले ।
नइ लागय बाहिर मा मन हा, चित चेत सदा घर कोत ढुले ।।
*
दोहा
*
कइसे बुलकत जात हे, संझा बिहना रात।
पल्ला भागत बेर हा, तबले नहीं जनात ।।
*
कहरवा
*
फक-फक हाँसत पलना खेलत,
पाँव पटक के लाल दुलरवा ।
बाजत पैजन गोड़ छनाछन,
राखत मातु संभाल दुलरवा ।
सेंकत चुपरत पोंछ अँगोछत,
होवत सबो निहाल दुलरवा ।
काजर आँजत केश सँवारत ,
चूमत चाँटत गाल दुलरवा ।
सुंदर रूप सजावत मइया,
लटकत लट घुंँघराल दुलरवा ।।
लोरी सुना हलात डुलावत,
पउढ़ा पंखा झाल दुलरवा ।।
*
सोरठा
*
सेम्हर पोनी लान, गढ़े सुपेती ला बने ।
सुतत जीव धन प्रान, सरसों के तकिया लगा ।।
*
लोरी
*
सो जा रे चंदा, सो जा रे तारा ।
सो जा रे सो जा,राज दुलारा ।।
सोगे हे गलियन, सोगे हे पारा ।।होहोहोहोहोहो
होहोहोहोहोहो
सोजा रे मोरे, करेजा के चानी ।
सोजा रे लल्ला, सो जा रे बचकानी ।।
सोगे हे गइया, बझरू रे झारा ।।होहोहोहोहोहो होहोहोहोहोहो
*
सरसी
*
बीतत बेरा सरसर सरसर, पंख लगाय समान।
नाम धराइन लइका सुंदर, पोथी पतरा लान।।
मुँह जुठारिन चाँदी चमचा, सुघर राँधके खीर।
रनबन-रनबन अब तो खेलत,रखत नजर के तीर।।
*
तोटक
*
अब खेलत हे अँगना भर मा।
परसार कभू अउ बागड़ मा ।।
नइ ओलम नैन करै मइया ।
कनिहा लटकाय रखे छँइया ।।
बड़ सुंदर ओंठ कपोल हवै ।
अउ हाथ व गोड़ ह गोल हवै ।।
ढ़ीक सोन जरी झबला पहिरे ।
सुखरूप बखान सकौं नहि रे ।
*
ताटंक
*
गरन परे हे हाथ गोड़ मा, दू ठन दाँत ह
आये हे ।
ताम असन झलकत चुन्दी हर, बेनी सुघर गुँथाये हे ।
करधन पहिने हे कनिहा मा, लटकत लर मन भाये हे ।
पाँव म पैजन छुमछुम बाजत, चेत बुध बिसराये हे ।।
अपने छाँव खुँदत अउ झझकत, बछड़ा बिलरी पोटारे ।
पावत माटी कोड़ खबाखब, सटर पटर मुँह मा डारे ।।
मुँह उलाय ले रोवय गावय, लकठा आ कुहकी पारे ।
गिरे अपट के माडी छोलय, मूँड़ अपन फुतकी डारै ।
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