मैं नदी कैसे रुकूं, घर समंदर है |
रीत से चलते धरा ,नभ सूर्य चंदर है || मैं नदी कैसे रुकूं
देह वीणा हो तरंगित ,गा रही है नेह लहरी |
समय सम्प्रति याचनाएं ,बन गई हैं आज प्रहरी ||
भाव प्रांगण साधना का ,शुभ स्वयम्बर है | मैं नदी कैसे रुकूं
आत्मा होकर सुगन्धित,चली करने स्वत्व अर्पण |
देह का अभिमान झूठा, कह रहा है काल दर्पण ||
राह कोई रोकता कह , बाट पत्थर है। मैं नदी कैसे रुकूं
हैं जुगल चुप चाप बैठे ,पाँव अपने धार डाले |
एक अकारण ही पथिक मांझी भी है नाव डाले ||
कतारें पनिहारिनों की ,प्यारा मंजर है | मैं नदी कैसे रुकूं
घाट की रंगिनियों पर, मैं न मचलूँ रंग विरंगा |
तटों का चुम्बन तो करती , भाव पूजित लहर गंगा ||
जानती हूँ नेह पथ सब भाव उर्वर है | मैं नदी कैसे रुकूं
कवियित्री शोभामोहन श्रीवास्तव

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