Sunday, 7 July 2019

"मैं नदी कैसे रुकूं"

मैं नदी कैसे रुकूं, घर समंदर है | 
रीत से चलते धरा ,नभ सूर्य चंदर है || मैं नदी कैसे रुकूं

देह वीणा हो तरंगित ,गा रही है नेह लहरी | 
समय सम्प्रति याचनाएं ,बन गई हैं आज प्रहरी || 

भाव प्रांगण साधना का ,शुभ स्वयम्बर है | मैं नदी कैसे रुकूं 

आत्मा होकर सुगन्धित,चली करने स्वत्व अर्पण | 
देह का अभिमान झूठा, कह रहा  है काल  दर्पण || 

राह कोई रोकता कह , बाट पत्थर है। मैं नदी कैसे रुकूं

हैं जुगल चुप चाप बैठे ,पाँव अपने धार डाले  | 
एक अकारण ही  पथिक मांझी भी है नाव डाले || 

कतारें पनिहारिनों  की ,प्यारा मंजर है | मैं नदी कैसे रुकूं  

घाट की रंगिनियों पर, मैं न मचलूँ रंग विरंगा | 
तटों का चुम्बन तो करती , भाव पूजित लहर गंगा || 

जानती हूँ नेह पथ सब भाव उर्वर है | मैं नदी कैसे रुकूं 

कवियित्री शोभामोहन श्रीवास्तव 




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